Breaking : ऐतिहासिक फैसला: मासिक धर्म स्वच्छता मौलिक अधिकार, स्कूलों में मुफ्त सेनेटरी पैड अनिवार्य
Breaking : नई दिल्ली। 30 जनवरी 2026 : सुप्रीम कोर्ट ने लड़कियों के स्वास्थ्य, गरिमा और शिक्षा के अधिकार को मजबूती देने वाला ऐतिहासिक और दूरगामी फैसला सुनाया है। शीर्ष अदालत ने मासिक धर्म स्वच्छता (Menstrual Hygiene) को संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार और निजता के अधिकार का अभिन्न हिस्सा घोषित किया है। साथ ही इसे अनुच्छेद 21A के तहत मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा के अधिकार से भी जोड़ा गया है।
जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को निर्देश दिए हैं कि देश के हर स्कूल—सरकारी, निजी और सहायता प्राप्त में कक्षा 6 से 12 तक की छात्राओं को मुफ्त में ऑक्सो-बायोडिग्रेडेबल सेनेटरी पैड उपलब्ध कराए जाएं। आदेश का पालन न करने पर निजी स्कूलों की मान्यता रद्द करने तक की सख्त कार्रवाई की चेतावनी दी गई है।
क्या था मामला
सामाजिक कार्यकर्ता जया ठाकुर ने 10 दिसंबर 2024 को जनहित याचिका दायर कर केंद्र सरकार की Menstrual Hygiene Policy for School-going Girls को पूरे देश में लागू करने की मांग की थी। याचिका में कहा गया था कि मासिक धर्म के दौरान पर्याप्त सुविधाओं के अभाव में कई लड़कियां स्कूल छोड़ देती हैं, जिससे उनकी शिक्षा प्रभावित होती है और गरिमा का हनन होता है।
सुप्रीम कोर्ट के प्रमुख निर्देश
- मुफ्त सेनेटरी पैड: सभी स्कूलों में छात्राओं को उच्च सुरक्षा मानकों (ASTM D-6954 या D-694 अनुपालन) वाले बायोडिग्रेडेबल सेनेटरी पैड मुफ्त उपलब्ध कराए जाएं।
- शौचालय सुविधाएं: लड़के और लड़कियों के लिए अलग-अलग, स्वच्छ और कार्यशील टॉयलेट अनिवार्य हों। दिव्यांगों के अनुकूल टॉयलेट, पानी और साबुन की व्यवस्था सुनिश्चित की जाए।
- MHM कॉर्नर: हर स्कूल में Menstrual Hygiene Management Corner बनाया जाए, जहां अतिरिक्त यूनिफॉर्म, इनरवियर और डिस्पोजेबल बैग उपलब्ध हों।
- जागरूकता और प्रशिक्षण: छात्राओं, शिक्षकों और स्कूल स्टाफ को मासिक धर्म स्वच्छता पर नियमित प्रशिक्षण और जागरूकता कार्यक्रम दिए जाएं।
- सख्ती से अनुपालन: आदेश का पालन न करने पर निजी स्कूलों की मान्यता रद्द की जा सकती है, जबकि सरकारी स्कूलों की विफलता के लिए राज्य सरकारें सीधे जवाबदेह होंगी।
फैसले का महत्व
अदालत ने अपने फैसले में कहा कि मासिक धर्म सुविधाओं की कमी से लड़कियों की गरिमा, निजता और शिक्षा का अधिकार प्रभावित होता है तथा यह उनकी यौन और प्रजनन स्वास्थ्य पर भी नकारात्मक असर डालता है। यह निर्णय स्कूलों में लड़कियों की ड्रॉपआउट दर कम करने, लैंगिक समानता को बढ़ावा देने और स्वास्थ्य सुधारने की दिशा में मील का पत्थर माना जा रहा है।
यह फैसला स्पष्ट संदेश देता है कि मासिक धर्म कोई शर्म नहीं, बल्कि अधिकार है और अब इसे शिक्षा व्यवस्था का अनिवार्य हिस्सा माना जाएगा।
